- कोविड आइसीयू, एचडीयू और आइसोलेशन वार्ड में साफ-सफाई के भी नहीं पूरे हुए मानक
- विशेषज्ञों को अंदेशा- ब्लैक फंगस यानी म्यूकर माइकोसिस फैलने की यह भी हो सकती वजह
कोरोना की दूसरी लहर के दौरान कोविड हास्पिटलों में बरती गईं लापरवाही अब मरीजों की दुश्वारियां बढ़ा रही हैं। मार्च अंत से 15 मई तक कोरोना ने कहर बरपाया, जिससे संक्रमितों का अस्पतालों में तांता लगा रहा। इस वजह से कोविड आइसीयू, एचडीयू और आइसोलेशन वार्ड में साफ-सफाई के मानक पूरे नहीं हुए। मरीजों को ऑक्सीजन सप्लाई के लिए लगे वाॅल माउंट बबल ह्यूमीडिफायर का पानी तक नहीं बदला गया। आक्सीजन इससे होकर गुजरने पर नमी के साथ मरीजों तक पहुंचती है। न इसका पानी बदला और न ट्यूब। ऐसे में विशेषज्ञों को अंदेशा है कि ब्लैक फंगस यानी म्यूकर माइकोसिस फैलने की यह भी एक वजह हो सकती है। इसकी चपेट में प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने वाले मरीज आए।
कोरोना का संक्रमण कमजोर प्रतिरोधक क्षमता के मरीजों में तेजी से होता है। खासकर अनियंत्रित मधुमेह, किडनी, लिवर और कैंसर के मरीज, जो इम्यूनो कांप्रोमाइज होते हैं। इनमें किसी भी प्रकार का दूसरा संक्रमण भी तेजी से फैलता है। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान कोविड हॉस्पिटल के इंटेंसिव केयर यूनिट (आइसीयू) हाई डिपेंडेंसी यूनिट (एचडीयू) और आइसोलेशन वार्ड के उपकरणों की साफ-सफाई ठीक से नहीं की गई। खासकर पाइप लाइन के पोर्ट से ह्यूमीडिफायर से होते हुए आक्सीजन मरीजों काे मास्क के द्वारा दी जाती है।
आपाधापी में नहीं बदली ट्यूब न पानी
कोविड हॉस्पिटलों में मरीजों का जबरदस्त दबाव था। ऐसे में आक्सीजन पाइप लाइन को पोर्ट से लगे वाल माउंड बबल ह्यूमीडिफायर से ट्यूट को जोड़ कर मरीजों को आक्सीजन दी जाती है। कोरोना काल में एक मरीज के हटते दूसरा मरीज भर्ती हो रहा था। ऐसे में न ट्यूब बदली गई और न ही ह्यूमीडिफायर का पानी बदला गया। इसलिए यहां उत्पन्न फंगल पहले से इम्यूनो कंप्रोमाइज में तेजी से नाक मुंह के जरिए फैलता चला गया।
न फ्यूमिगेशन और न सैंपलिंग
कोरोना के संक्रमण की पीक के दौरान मरीजों का अत्याधिक दबाव था। ऐसे में इलाज करने वाले डॉक्टर मरीजों की देखभाल में मुस्तैदी से डटे रहे। वहीं, कई डॉक्टरों ने अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई। कोविड हॉस्पिटलों के आइसीयू, एचडीयू और आइसोलेशन वार्ड में संक्रमण कम करने के लिए न फ्यूमिगेशन नहीं कराया। न ही बैक्टीरिया, वायरस और फंगल की स्थिति का पता लगाने के लिए कल्चर जांच के लिए सैंपलिंग भी नहीं कराई।
बैक्टीरिया की तरफ ही फंगल के स्पोर्स हमारे वातावरण में मौजूद रहते हैं। खासकर गंदगी में तेजी से पनपते हैं। लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन सिलिंडर से जब आती है तो शुष्क और ठंडी होती है। इसलिए इसे ह्यूमीडिफयरस से गुजारा जाता है ताकि पानी से नमी मिले और आक्सीजन शरीर के तामपान के हिसाब से गम हो सके। इसलिए नियमत: ह्यूमीडिफायर में डिस्टिल वाटर या मिनरल वाटर का इस्तेमाल होना चाहिए। स्वास्थ्यकर्मी जानकारी के अभाव में नल का पानी भर देते हैं। कई दिनों तक पानी न बदले जाने से उसमें फंगल ग्रो करने लगते हैं, जो मरीजों के लिए घातक साबित होते हैं। इस पर देश भर के विशेषज्ञ भी चर्चा कर रहे हैं।
- डॉ. एसी अग्रवाल, वरिष्ठ फिजीशियन एवं डायबटोलॉजिस्ट।
कोविड के दौरान आपाधापी रही। बड़ी संख्या में फैकल्टी भी संक्रमित हो गई थी। किसी तरह काम चलाया गया। संक्रमण अब थमा है। माइक्रोबायोलॉजी विभागाध्यक्ष को कोविड आइयीयू, एचडीयू और आइसोलेशन वार्ड का फ्यूमिगेशन कराने का निर्देश दिया है। ह्यूमीडिफायर समेत सभी उपकरणों से सैंपल लेकर कल्चर जांच कराने को पत्र लिखा है, जांच रिपोर्ट आने के बाद उन्हें संक्रमण रहित कराने की प्रक्रिया शुरू कराएंगे। इससे यह भी पता चलेगा कि कौन से बैक्टीरिया, वायरस व फंगल पाए गए।
- प्रो. आरबी कमल, प्राचार्य, जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज।
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